भारतीय संविधान की 9वीं अनुसूची क्या है

ये बात सभी जानते हैं कि संविधान का जब निर्माण हुआ उस समय संविधान में  कुल 22 भाग और 8 अनुसूचियां थीं | उसके बाद संविधान में संवैधानिक संशोधनों के द्वारा अनुसूचियों की संख्या 8 से बढ़कर 12 हो गई है । सबसे पहले संविधान संशोधन अधिनियम के द्वारा 1951 में 9वीं अनुसूची को भारत के संविधान में लाया गया था | इस संविधान संशोधन के अंतरगत  नौवीं अनुसूची में कुल 13 कानून शामिल किये गए थे | वर्तमान में 9वीं अनुसूची में कानूनों कि संख्या अब 284 हो गई है | आज हम यहाँ इस  पेज पर भारतीय संविधान की 9वीं अनुसूची क्या है | संशोधन | 9th Schedule of Indian Constitution in Hindi के बारे में विस्तार से बता रहें हैं | 

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9वीं अनुसूची की क्या जरुरत थी : ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

भारत देश 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र हुआ था | स्वतंत्रता के लगभग 28 माह बाद यानि की 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू हुआ और इसी के साथ भारत एक लोकतांत्रिक और गणतंत्र देश बन गया | जब हम बात भारतीय संविधान की 9वीं अनुसूची के ऐतिहासिक रूप की करते हैं तो हम पाते है कि इसे भारत में हुए भूमि सुधार कानूनों के सन्दर्भ में लाया गया था | आपको अगर न मालूम हो कि भूमि सुधारका यहाँ क्या अर्थ है तो पहले इसके जान लीजिये भूमि सुधार का तात्पर्य भूमि के स्थायित्त्व और प्रबंधन के मौजूदा पैटर्न को बदलने हेतु किये गए संस्थागत सुधार से हैं |

भारत में भूमि सुधार शुरू हुए तो उन्हें मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार के न्यायालयों में चुनौती दी गई, जिसमें से बिहार में न्यायालय ने इसे अवैध घोषित कर दिया था। इस विषम परिस्थिति से बचने और भूमि सुधारों को जारी रखने के लिये ही सरकार ने प्रथम संविधान संशोधन करने का फैसला किया था जिसके फलस्वरूप 8 मई, 1951 को तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु ने अनंतिम संसद में प्रथम संविधान संशोधन विधेयक प्रस्तुत किया, जिसके पश्चात् 16 मई, 1951 को यह विधेयक चयन समिति को भेज दिया गया। चयन समिति की रिपोर्ट के बाद 18 जून, 1951 को राष्ट्रपति की मंज़ूरी के साथ ही यह विधेयक अधिनियम बन गया।

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भारतीय संविधान की 9वीं अनुसूची क्या है (9th Schedule of Indian Constitution)

आइये अब देखते हैं कि आखिर ये भारतीय संविधान की 9वीं अनुसूची (9th Schedule) क्या है ? 9वीं अनुसूची में केंद्र और राज्य कानूनों की एक ऐसी सूची (Schedule) है, जिसको न्यायालय के समक्ष चुनौती नहीं दी जा सकती।आपको पता होना चाहिए कि वर्तमान में संविधान की 9वीं अनुसूची में कुल 284 कानून शामिल हैं, जिन्हें न्यायिक समीक्षा संरक्षण प्राप्त है अर्थात इन्हें अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती है। 9वीं अनुसूची को वर्ष 1951 में प्रथम संविधान संशोधन अधिनियम के माध्यम से भारतीय संविधान में शामिल किया गया था। यह पहली बार था, जब संविधान में संशोधन किया गया था। यहाँ ध्यान देने योग्य बात है कि संविधान की 9वीं अनुसूची में शामिल विभिन्न कानूनों को संविधान के अनुच्छेद 31B के तहत संरक्षण प्राप्त होता है।

यहाँ एक बात और गौर करने वाली है कि 9वीं अनुसूची प्रकृति में पूर्वव्यापी (Retrospective) है, जिसका अर्थ है, न्यायालय द्वारा असंवैधानिक घोषित होने के बाद भी यदि किसी कानून को 9वीं अनुसूची में शामिल किया जाता है तो वह उस तारीख से संवैधानिक रूप से वैध माना जाएगा। जैसे कि हमने आपको ऊपर ही बताया कि पहले संविधान संशोधन के माध्यम से नौवीं अनुसूची में कुल 13 कानून शामिल किये गए थे, जिसके पश्चात् विभिन्न संविधान संशोधन किये गए और अब कानूनों की संख्या 284 हो गई है।

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9वीं अनुसूची की समीक्षा के बारे में

“सुप्रीम कोर्ट के नौ न्यायाधीशों की एक संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से फैसला दिया कि संविधान के भाग तीन में प्रदत्त मौलिक अधिकार संविधान के मूल ढांचे का अहम हिस्सा है। इनका किसी भी तरीके से उल्लंघन किए जाने पर न्यायालय इसकी समीक्षा कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा कहा गया है कि 24 अप्रैल 1973 के बाद संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल किए गए किसी भी कानून की न्यायिक समीक्षा हो सकती है।“

24 अप्रैल, 1973 को सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष “केशवानंद भारती” नाम का एक मामला आया जोकि बहुत ही प्रसिद्ध मामला है | इस मामले में आए सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद संविधान की 9वीं अनुसूची में शामिल किये गए किसी भी कानून की न्यायिक समीक्षा हो सकती है।

इस मामले में न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि –

“नौवीं अनुसूची के तहत कोई भी कानून यदि मौलिक अधिकारों या संविधान की मूल संरचना का उल्लंघन करता है तो उसकी न्यायिक समीक्षा की जा सकेगी। “

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सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि –

“नौवीं अनुसूची के तहत कोई भी कानून अगर मौलिक अधिकारों या संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन करता है तो उसकी न्यायिक समीक्षा की जा सकती है | आगे यह भी स्पष्ट करते हुए टिप्पणी की, न्यायलय ने कहा कि किसी भी कानून को बनाने और इसकी वैधानिकता तय करने की शक्ति केवल विधायिका या कार्यपालिका पर नहीं छोड़ी जा सकती अगर संसद कानून बनाता है तो उसके द्वारा बनाये गए कानून की व्याख्या करने और उसकी समीक्षा करने की शक्ति न्यायालय के ही पास ही रहेगी | “

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लेकिन यहाँ ध्यान देने वाली बात ये है कि, किसी भी कानून की समीक्षा तभी की जा सकती है जब वह कानून मूल अधिकारों या फिर संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन होता हो |

मित्रों उपरोक्त वर्णन से आपको आज भारतीय संविधान की 9वीं अनुसूची क्या है | संशोधन | 9th Schedule of Indian Constitution in Hindi ? इसके बारे में जानकारी हो गई होगी | भारतीय संविधान की 9वीं अनुसूची का क्या अर्थ  है इसके बारे में विस्तार से हमने उल्लेख किया है, यदि फिर भी इससे सम्बन्धित या अन्य किसी भी प्रकार की कुछ भी शंका आपके मन में हो या अन्य कोई जानकारी प्राप्त करना चाहते है, तो आप  हमें  कमेंट  बॉक्स  के  माध्यम  से अपने प्रश्न और सुझाव हमें भेज सकते है | इसको अपने मित्रो के साथ शेयर जरूर करें |

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