सीआरपीसी की धारा 146 क्या है | Section 146 CRPC in Hindi


सीआरपीसी की धारा 146  क्या है

दंड प्रक्रिया सहिता में विवाद की विषयवस्तु की कुर्क करने की और रिसीवर नियुक्त करने की शक्तिइसका प्रावधान सीआरपीसी (CrPC) की धारा 146 में  किया गया है | यहाँ हम आपको ये बताने का प्रयास करेंगे कि दंड प्रक्रिया सहिता (CrPC) की धारा 146 के लिए किस तरह अप्लाई होगी | दंड प्रक्रिया सहिता यानि कि CrPC की धारा 146 क्या है ? इसके सभी पहलुओं के बारे में विस्तार से यहाँ समझने का प्रयास करेंगे | आशा है हमारी टीम द्वारा किया गया प्रयास आपको पसंद आ रहा होगा |



(CrPC Section 146) Dand Prakriya Sanhita Dhara 146 (विवाद की विषयवस्तु की कुर्क करने की और रिसीवर नियुक्त करने की शक्ति)

इस पेज पर दंड प्रक्रिया सहिता की धारा 146 में “विवाद की विषयवस्तु की कुर्क करने की और रिसीवर नियुक्त करने की शक्तिइसके बारे में क्या प्रावधान बताये गए हैं ? इनके बारे में पूर्ण रूप से इस धारा में चर्चा की गई है | साथ ही दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 146 कब नहीं लागू होगी ये भी बताया गया है ? इसको भी यहाँ जानेंगे, साथ ही इस पोर्टल www.nocriminals.org पर दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की अन्य महत्वपूर्ण धाराओं के बारे में विस्तार से बताया गया है आप उन आर्टिकल के माध्यम से अन्य धाराओं के बारे में भी विस्तार से जानकारी  ले सकते हैं |

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CrPC (दंड प्रक्रिया संहिता की धारा ) की धारा 146 के अनुसार :-

विवाद की विषयवस्तु की कुर्क करने की और रिसीवर नियुक्त करने की शक्ति–

(1) यदि धारा 145 की उपधारा (1) के अधीन आदेश करने के पश्चात् किसी समय मजिस्ट्रेट मामले को आपातिक समझता है अथवा यदि वह विनिश्चय करता है कि पक्षकारों में से किसी का धारा 145 में यथानिर्दिष्ट कब्जा उस समय नहीं था, अथवा यदि वह अपना समाधान नहीं कर पाता है कि उस समय उनमें से किसका ऐसा कब्जा विवाद की विषयवस्तु पर था तो वह विवाद की विषयवस्तु को तब तक के लिए कुर्क कर सकता है जब तक कोई सक्षम न्यायालय उसके कब्जे का हकदार व्यक्ति होने के बारे में उसके पक्षकारों के अधिकारों का अवधारण नहीं कर देता है:

परंतु यदि ऐसे मजिस्ट्रेट का समाधान हो जाता है कि विवाद की विषयवस्तु के बारे में परिशांति भंग होने की कोई संभाब्यता नहीं रही तो वह किसी समय भी कुर्की वापस ले सकता है।

(2) जब मजिस्ट्रेट विवाद की विषयवस्तु को कुर्क करता है तब यदि ऐसी विवाद की विषयवस्तु के संबंध में कोई रिसीवर किसी सिविल न्यायालय द्वारा नियुक्त नहीं किया गया है तो, वह उसके लिए ऐसा इंतजाम कर सकता है जो वह उस संपत्ति की देखभाल के लिए उचित समझता है अथवा यदि वह ठीक समझता है तो, उसके लिए रिसीवर नियुक्त कर सकता है जिसको मजिस्ट्रेट के नियंत्रण के अधीन रहते हुए वे सब शक्तियां प्राप्त होगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन रिसीवर की होती हैं :

परंतु यदि विवाद की विषयवस्तु के संबंध में कोई रिसीवर किसी सिविल न्यायालय द्वारा बाद में नियुक्त कर दिया जाता है तो मजिस्ट्रेट

(क) अपने द्वारा नियुक्त रिसीवर को आदेश देगा कि वह विवाद की विषयवस्तु का कब्जा सिबिल न्यायालय द्वारा नियुक्त रिसीवर को दे दे और तत्पश्चात् वह अपने द्वारा नियुक्त रिसीवर को उन्मोचित कर देगा,

(ख) ऐसे अन्य आनुषंगिक या पारिणामिक आदेश कर सकेगा जो न्यायसंगत हैं।

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According to Section. 146 – “Power to Attach Subject of Dispute and to Appoint Receiver ”–

(1) If the Magistrate at any time after making the order under sub- section (1) of section 145 considers the case to be one of emergency, or if he decides that none of the parties was then in such possession as is referred to in section 145, or if he is unable to satisfy himself as to which of them was then in such possession of the subject of dispute, he may attach the subject of dispute until a competent Court has determined the rights of the parties thereto with regard to the person entitled to the possession thereof: Provided that such Magistrate may withdraw the attachment at any time if he is satisfied that there is no longer any likelihood of breach of the peace with regard to the subject of dispute.

(2) When the Magistrate attaches the subject of dispute, he may, if no receiver in relation to such subject of dispute has been appointed by any Civil Court, make such arrangements as he considers proper for looking after the property or if he thinks fit, appoint a receiver thereof, who shall have, subject to the control of the Magistrate, all the powers of a receiver appointed under the Code of Civil Procedure, 1908 (5 of 1908 );

Provided that in the event of a receiver being subsequently appointed in relation to the subject of dispute by any Civil Court, the Magistrate-

(a) shall order the receiver appointed by him to hand over the possession of the subject of dispute to the receiver appointed by the Civil Court and shall thereafter discharge the receiver appointed by him;

(b) may make such other incidental or consequential orders as may be just.

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आपको आज  दंड प्रक्रिया संहिता  की धारा 146 “विवाद की विषयवस्तु की कुर्क करने की और रिसीवर नियुक्त करने की शक्तिइसके  बारे में जानकारी हो गई होगी | कैसे इस धारा को लागू किया जायेगा ?  इन सब के बारे में विस्तार से हमने उल्लेख किया है, यदि फिर भी इस धारा से सम्बन्धित या अन्य धाराओं से सम्बंधित किसी भी प्रकार की कुछ भी शंका आपके मन में हो या अन्य कोई जानकारी प्राप्त करना चाहते है, तो आप  कमेंट बॉक्स के माध्यम से अपने प्रश्न और सुझाव हमें भेज सकते है |

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