आईपीसी धारा 201 क्या है | IPC Section 201 in Hindi – विवरण, सजा का प्रावधान

आईपीसी धारा 201 क्या है

एक लॉ के स्टूडेंट के लिए जितनी भी भारतीय दंड संहिता (IPC) की महत्वपूर्ण धाराएं हैं उनके बारे में हम आपके लिए बहुत ही सहज रूप से उनको यहाँ इस पोर्टल पर प्रस्तुत कर रहे है | ये महत्वपूर्ण धाराएं जो की एग्जाम की दृस्टि से तो महत्वपूर्ण है ही साथ ही हमारे डेली लाइफ में भी इन धाराओं के बारे में जानना बहुत आवश्यक है | भारतीय दंड संहिता में अपराध के साक्ष्य का विलोपन, या अपराधी को प्रतिच्छादित करने के लिए मिथ्या इत्तिला देनाइसको भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 201 में परिभाषित (डिफाइन) किया गया है |  यहाँ हम आपको बताने जा रहे हैं कि भारतीय दंड सहिता (IPC) की धारा 201 किस तरह अप्लाई होगी | भारतीय दंड संहिता यानि कि IPC की धारा 201 क्या है, इसके बारे में भी आप यहाँ जानेंगे |

इस पोर्टल के माध्यम से यहाँ धारा 201 में सजा के बारे में क्या प्रावधान बताये गए हैं, और इसमें कितनी सजा देने की बात कही गई है? इनके बारे में पूर्ण रूप से बात होगी | साथ ही भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 201 में जमानत के बारे में क्या बताया गया है ? सभी बातों को आज हम विस्तृत रूप से यहाँ जानेंगे, साथ ही इस पोर्टल www.nocriminals.org पर अन्य महत्वपूर्ण धाराओं के बारे में विस्तार से बताया गया है आप उन आर्टिकल के माध्यम से अन्य धाराओं के बारे में भी विस्तार से जानकारी प्राप्त कर सकते हैं |

आईपीसी धारा 279 क्या है 

IPC (भारतीय दंड संहिता की धारा ) की धारा 201 के अनुसार :-

अपराध के साक्ष्य का विलोपन, या अपराधी को प्रतिच्छादित करने के लिए मिथ्या इत्तिला देना-

“अपराध के साक्ष्य का विलोपन, या अपराधी को प्रतिच्छादित करने के लिए मिथ्या इत्तिला देना-जो कोई यह जानते हुए या यह विश्वास करने का कारण रखते हुए कि कोई अपराध किया गया है, उस अपराध के किए जाने के किसी साक्ष्य का विलोप, इस आशय से कारित करेगा कि अपराधी को वैध दंड से प्रतिच्छादित करे या उस आशय से उस अपराध से संबंधित कोई ऐसी इत्तिला देगा, जिसके मिथ्या होने का उसे ज्ञान या विश्वास है ;

यदि अपराध मृत्यु से दंडनीय होयदि वह अपराध जिसके किए जाने का उसे ज्ञान या विश्वास है, मृत्यु से दंडनीय हो, तो वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दंडित किया जाएगा और जुर्माने से भी टंडनीय होगा;

यदि आजीवन कारावास से दंडनीय हो और यदि वह अपराध [आजीवन कारावास से, या ऐसे कारावास से, जो दस वर्ष तक का हो सकेगा, दंडनीय हो, तो वह दोनों में से किसी भांति के, कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी दंडित किया जाएगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा;

यदि दस वर्ष से कम के कारावास से दंडनीय हो और यदि वह अपराध ऐसे कारावास से इतनी अवधि के लिए दंडनीय हो, जो दस वर्ष तक की न हो, तो वह उस अपराध के लिए उपबंधित भांति के कारावास से उतनी अवधि के लिए, जो उस अपराध के लिए उपबंधित कारावास की दीर्घतम अवधि की एक-चौथाई तक की हो सकेगी या जुर्माने से, या दोनों से, दंडित किया जाएगा ।

दृष्टांत –

क यह जानते हुए कि ख ने य की हत्या की है ख को दंड से प्रतिच्छादित करने के आशय से मृत शरीर को छिपाने में ख की सहायता करता है | क सात वर्ष के लिए दोनों में से किसी भांति के कारावास से, और जुर्माने से भी दंडनीय है “|

S. 201 – “Causing disappearance of evidence of offence, or giving false information to screen offender ”–

Whoever, knowing or having reason to believe that an offence has been committed, causes any evidence of the commission of that offence to disappear, with the intention of screening the offend­er from legal punishment, or with that intention gives any infor­mation respecting the offence which he knows or believes to be false;

if a capital offence.—shall, if the offence which he knows or believes to have been committed is punishable with death, be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to seven years, and shall also be liable to fine;

if punishable with imprisonment for life.—and if the offence is punishable with 1[imprisonment for life], or with imprisonment which may extend to ten years, shall be punished with imprison­ment of either description for a term which may extend to three years, and shall also be liable to fine;

if punishable with less than ten years’ imprisonment.—and if the offence is punishable with imprisonment for any term not extend­ing to ten years, shall be punished with imprisonment of the description provided for the offence, for a term which may extend to one-fourth part of the longest term of the imprisonment pro­vided for the offence, or with fine, or with both.

Illustration –

A, knowing that B has murdered Z, assists B to hide the body with the intention of screening B from punishment. A is liable to imprisonment of either description for seven years, and also to fine.

आईपीसी धारा 294 क्या है 

लागू अपराध

अपराध के साक्ष्य का विलोपन, या अपराधी को प्रतिच्छादित करने के लिए झूठी जानकारी देना अपराध माना गया है। यहाँ तीन स्थतियाँ उत्पन्न होती है  

1. यदि अपराध मॄत्यु से दण्डनीय हो, तब

सजा – 7 वर्ष कारावास साथ में आर्थिक दण्ड से भी दण्डित किया जायेगा ।

यह एक जमानती, गैर-संज्ञेय अपराध है और सत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय है

2. यदि अपराध आजीवन कारावास या 10 वर्ष तक के कारावास से दण्डनीय हो, तब –

सजा – 3 वर्ष कारावास + आर्थिक दण्ड से भी दण्डित किया जायेगा।

यह एक जमानती, गैर-संज्ञेय अपराध है और प्रथम श्रेणी के मेजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय है।

3. यदि अपराध 10 वर्ष से कम के कारावास से दण्डनीय हो, तब-

सजा – अपराध के लिए उपबंधित कारावास की अवधि की 1/4 अवधि, या , या दोनों से।

यह एक जमानती, गैरसंज्ञेय अपराध है तथा अदालती कार्यवाही अपराध अनुसार होगी।

यह समझौता करने योग्य नहीं है।

आईपीसी धारा 332 क्या है 

आईपीसी की धारा 201 में सजा (Punishment) क्या होगी

“गंभीर उत्तेजना के बिना ही हमला या आपराधिक बल का प्रयोग करना “यह भारतीय दंड संहिता में धारा 201 के तहत अपराध माना जाता है | यहाँ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 201 में किये गए अपराध के लिए सजा को निर्धारित किया गया हैं | इसके लिए उस व्यक्ति को जिसके द्वारा ऐसा किया गया है उसको कारावास की सजा जो कि 3 माह तक का हो सकता है और आर्थिक दंड से फिर दोनों से, दण्डित किया जायेगा | यह एक गैर – संज्ञेय, जमानती अपराध  है और यह मामला किसी भी  मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय (ट्रायल किया जा सकता ) है। यह अपराध पीड़ित व्यक्ति (जिस पर हमला या आपराधिक बल का प्रयोग हुआ है) द्वारा समझौता करने योग्य है।

आईपीसी (IPC) की धारा 352 में  जमानत  (BAIL) का प्रावधान

भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 201 में जिस अपराध की सजा के बारे में बताया गया है उस अपराध को एक जमानती और गैर – संज्ञेय अपराध बताया गया है | CrPC में यह जमानतीय अपराध बताया गया है ।

आपको आज भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 201 के बारे में जानकारी हो गई होगी | इसमें क्या अपराध बनता है कैसे इस धारा को लागू किया जायेगा | इस अपराध को कारित करने पर क्या सजा होगी ?  इन सब के बारे में विस्तार से हमने उल्लेख किया है, साथ ही इसमें जमानत के क्या प्रावधान होंगे ? यदि फिर भी इस धारा से सम्बन्धित या अन्य धाराओं से सम्बंधित किसी भी प्रकार की कुछ भी शंका आपके मन में हो या अन्य कोई जानकारी प्राप्त करना चाहते है, तो आप  हमें  कमेंट बॉक्स के माध्यम से अपने प्रश्न और सुझाव हमें भेज सकते है |

आईपीसी धारा 338 क्या है

अपराधसजासंज्ञेयजमानतविचारणीय
एक अपराध के सबूत के गायब होने के कारण, या गलत जानकारी देने के लिए यह अपराधियों पर नज़र रखने के लिए, अगर एक राजधानी अपराध है7 साल तक की जेल + जुर्माने से, दोनों से, दण्डितगैर – संज्ञेयजमानतीयसत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय (ट्रायल किया जा सकता)
अगर आजीवन कारावास या 10 साल कैद की सजा3 साल तक की जेल + जुर्माने से, दोनों से, दण्डितगैर – संज्ञेयजमानतीयकिसी भी मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय (ट्रायल किया जा सकता)
अगर 10 साल से कम की कैद की सजाअपराध के लिए उपबंधित कारावास की अवधि की 1/4 अवधि, या , या दोनों से।गैर – संज्ञेयजमानतीयकिये गए अपराध के समान

आईपीसी धारा 336 क्या है

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