सीआरपीसी की धारा 164 क्या है | Section 164 CRPC in Hindi

सीआरपीसी की धारा 164 क्या है

दंड प्रक्रिया सहिता में संस्वीकृतियों और कथनों को अभिलिखित करनाइसका प्रावधान सीआरपीसी (CrPC) की धारा 164 में  किया गया है | यहाँ हम आपको ये बताने का प्रयास करेंगे कि दंड प्रक्रिया सहिता (CrPC) की धारा 164 किस तरह अप्लाई होगी | दंड प्रक्रिया सहिता यानि कि CrPC की धारा 164 क्या है ? इसके सभी पहलुओं के बारे में विस्तार से यहाँ समझने का प्रयास करेंगे | आशा है हमारी टीम द्वारा किया गया प्रयास आपको पसंद आ रहा होगा |

सीआरपीसी की धारा 107 क्या है

(CrPC Section 164) Dand Prakriya Sanhita Dhara 164

इस पेज पर दंड प्रक्रिया सहिता की धारा 164 में “संस्वीकृतियों और कथनों को अभिलिखित करनाइसके बारे में क्या प्रावधान बताये गए हैं ? इनके बारे में पूर्ण रूप से इस धारा में चर्चा की गई है | साथ ही इस पोर्टल www.nocriminals.org पर दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की अन्य महत्वपूर्ण धाराओं के बारे में विस्तार से बताया गया है आप उन आर्टिकल के माध्यम से अन्य धाराओं के बारे में भी विस्तार से जानकारी  ले सकते हैं |

सीआरपीसी की धारा 125 क्या है

CrPC (दंड प्रक्रिया संहिता की धारा ) की धारा 164 के अनुसार :-

संस्वीकृतियों और कथनों को अभिलिखित करना—

(1) कोई महानगर मजिस्ट्रेट या न्यायिक मजिस्ट्रेट, चाहे उसे मामले में अधिकारिता हो या न हो, इस अध्याय के अधीन या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन किसी अन्वेषण के दौरान या तत्पश्चात् जांच या विचारण प्रारंभ होने के पूर्व किसी समय अपने से की गई किसी संस्वीकृति या कथन को अभिलिखित कर सकता है:

परंतु इस उपधारा के अधीन की गई कोई संस्वीकृति या कथन अपराध के अभियुक्त व्यक्ति के अधिवक्ता की उपस्थिति में श्रव्य-दृश्य इलैक्ट्रानिक साधनों द्वारा भी अभिलिखित किया जा सकेगा:

परंतु यह और कि किसी पुलिस अधिकारी द्वारा, जिसे तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन मजिस्ट्रेट की कोई शक्ति प्रदत्त की गई है, कोई संस्वीकृति अभिलिखित नहीं की जाएगी।]

(2) मजिस्ट्रेट किसी ऐसी संस्वीकृति को अभिलिखित करने के पूर्व उस व्यक्ति को, जो संस्वीकृति कर रहा है, यह समझाएगा कि वह ऐसी संस्वीकृति करने के लिए आबद्ध नहीं है और यदि वह उसे करेगा तो वह उसके विरुद्ध साक्ष्य में उपयोग में लाई जा सकती है; और मजिस्ट्रेट कोई ऐसी संस्वीकृति तब तक अभिलिखित न करेगा जब तक उसे करने वाले व्यक्ति से प्रश्न करने पर उसको यह विश्वास करने का कारण न हो कि वह स्वेच्छा से की जा रही है।

(3) संस्वीकृति अभिलिखित किए जाने से पूर्व यदि मजिस्ट्रेट के समक्ष हाजिर होने वाला व्यक्ति यह कथन करता है कि वह संस्वीकृति करने के लिए इच्छुक नहीं है तो मजिस्ट्रेट ऐसे व्यक्ति के पुलिस की अभिरक्षा में निरोध को प्राधिकृत नहीं करेगा।

(4) ऐसी संस्वीकृति किसी अभियुक्त व्यक्ति की परीक्षा को अभिलिखित करने के लिए धारा 281 में उपबंधित रीति से अभिलिखित की जाएगी और संस्वीकृति करने वाले व्यक्ति द्वारा उस पर हस्ताक्षर किए जाएंगे; और मजिस्ट्रेट ऐसे अभिलेख के नीचे निम्नलिखित भाव का एक ज्ञापन लिखेगा:

 “मैंने–(नाम)—को यह समझा दिया है कि वह संस्वीकृति करने के लिए आबद्ध नहीं है और यदि वह ऐसा करता है तो कोई संस्वीकृति, जो वह करेगा, उसके विरुद्ध साक्ष्य भी उपयोग में लाई जा सकती है और मुझे विश्वास है कि यह संस्वीकृति स्वेच्छा से की गई है। यह मेरी उपस्थिति में और मेरे सुनते हुए लिखी गई है और जिस व्यक्ति ने यह संस्वीकृति की है उसे यह पड़कर सुना दी गई है और उसने उसका सही होना स्वीकार किया है और उसके द्वारा किए गए कथन का पूरा और सही वृत्तांत इसमें है।

 (हस्ताक्षर क. ख मजिस्ट्रेट)

(5) उपधारा (1) के अधीन किया गया (संस्वीकृति से भिन्न) कोई कथन साक्ष्य अभिलिखित करने के लिए इसमें इसके पश्चात उपबंधित ऐसी रीति से अभिलिखित किया जाएगा जो मजिस्ट्रेट की राय में, मामले की परिस्थितियों में सर्वाधिक उपयुक्त हो; तथा मजिस्ट्रेट को उस व्यक्ति को शपथ दिलाने की शक्ति होगी जिसका कथन इस प्रकार अभिलिखित किया जाता है।

(5क) (क) भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 354, धारा 354क, धारा 354ख, धारा 354ग, धारा 354घ, धारा 376 की उपधारा (1) या उपधारा (2), धारा 376क, धारा 3760, धारा 376ग, धारा 376च, धारा 3766 या धारा 509 के अधीन दंडनीय मामलों में न्यायिक मजिस्ट्रेट उस व्यक्ति का, जिसके विरुद्ध उपधारा (5) में विहित रीति में ऐसा अपराध किया गया है. कथन जैसे ही अपराध का किया जाना पुलिस की जानकारी में लाया जाता है, अभिलिखित करेगा:

परन्तु यदि कथन करने वाला व्यक्ति अस्थायी या स्थायी रूप से मानिसक या शारीरिक रूप से नि:शक्त है, तो मजिस्ट्रेट कथन अभिलिखित करने में किसी द्विभाषिए या विशेष प्रबोधक की सहायता लेगा :

परन्तु यह है और कि यदि कथन करने वाला व्यक्ति अस्थायी रूप से मानसिक या शारीरिक रूप से नि:शक्त है तो किसी द्विभाषिए या विशेष प्रबोधक की सहायता से उस व्यक्ति द्वारा किए गए कथन की वीडियो फिल्म तैयार की जाएगी;

(ख) ऐसे किसी व्यक्ति के, जो अस्थायी या स्थायी रूप से मानसिक या शारीरिक रूप से नि:शक्त है, खंड (क) के अधीन अभिलिखित कथन को भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1872 का 1) की धारा 137 में यथाविनिर्दिष्ट मुख्य परीक्षा के स्थान पर एक कथन समझा जाएगा और ऐसा कथन करने वालों की, विचारण के समय उसको अभिलिखित करने की आवश्यकता के बिना, ऐसे कथन पर प्रतिपरीक्षा की जा सकेगी।]

(6) इस धारा के अधीन किसी संस्वीकृति या कथन को अभिलिखित करने वाला मजिस्ट्रेट, उसे उस मजिस्ट्रेट के पास भेजेगा जिसके द्वारा मामले की जांच या विचारण किया जाना है।

According to Section. 164 – “Recording of confessions and statements ”–

 (1) Any Metropolitan Magistrate or Judicial Magistrate may, whether or not he has jurisdiction in the case, record any confession or statement made to him in the course of an investigation under this Chapter or under any other law for the time being in force, or at any time afterwards before the commencement of the inquiry or trial: Provided that no confession shall be recorded by a police officer on whom any power of a Magistrate has been conferred under any law for the time being in force.

(2) The Magistrate shall, before recording any such confession, explain to the person making it that he is not bound to make a confession and that, if he does so, it may be used as evidence against him; and the Magistrate shall not record any such confession unless, upon questioning the person making it, he has reason to believe that it is being made voluntarily.

(3) If at any time before the confession is recorded, the person appearing before the Magistrate states that he is not willing to make the confession, the Magistrate shall not authorise the detention of such person in police custody.

(4) Any such confession shall be recorded in the manner provided in section 281 for recording the examination of an accused person and shall be signed by the person making the confession; and the Magistrate shall make a memorandum at the foot of such record to the following effect:-” I have explained to (name) that he is not bound to make a confession and that, if he does so, any confession he may make may be used as evidence against him and I believe that this confession was voluntarily made. It was taken in my presence and hearing, and was read over to the person making it and admitted by him to be correct, and it contains a full and true account of the statement made by him.

       (Signed) A. B. Magistrate”.

(5) Any statement (other than a confession) made under sub- section (1) shall be recorded in such manner hereinafter provided for the recording of evidence as is, in the opinion of the Magistrate, best fitted to the circumstances of the case; and the Magistrate shall have power to administer oath to the person whose statement is so recorded.

(6) The Magistrate recording a confession or statement under this section shall forward it to the Magistrate by whom the case is to be inquired into or tried.

सीआरपीसी (दण्ड प्रक्रिया संहिता) क्या है

धारा 164 का बयान  | कलमबंद बयान क्या होता है | 164 के बयान की अहमियत ज्यादा

सीआरपीसी 161 गवाह से पूछताछ के समय पुलिस द्वारा उसका बयान दर्ज करना इस 161 धारा के अंतर्गत आता है |

मामले में गवाह से पूछताछ के दौरान पुलिस यह बयान दर्ज करती है। बयान पर गवाह के हस्ताक्षर होने जरूरी नहीं। यहाँ ये धयान देने वाली बात है कि इस बयान को कई बार भी दर्ज करवाया जा सकता है।

सीआरपीसी 164 – गवाह का मैजिस्ट्रेट के सामने बयान दर्ज कराना

गवाह का मैजिस्ट्रेट के सामने बयान दर्ज कराने की प्रक्रिया में, पुलिस संबंधित कोर्ट में अर्जी दायर करती है, जो उसे संबंधित मैजिस्ट्रेट के पास भेज देता है। बयान दर्ज करते समय मैजिस्ट्रेट और गवाह के अलावा अन्य कोई भी व्यक्ति, अधिकारी या वकील वहां नहीं होता। इसे ही कलमबंद बयान या धारा 164 का बयान कहते हैं | इस बयान पर गवाह के साइन जरूरी है और कोर्ट में इस बयान की अहमियत सबसे ज्यादा है। यह बयान एक ही बार दर्ज होता है। इसलिए 164 के बयान की अहमियत ज्यादा मानी जाती है | 

आईपीसी (IPC) का क्या मतलब होता है              

धारा 164 के बयान और संस्वीकृति क्या होती है

दंड प्रकिया संहिता की धारा 164 की उपधारा 1 में संस्वीकृति और कथनों को अभिलिखित करने की प्रक्रिया के बारे में बताया गया है। इस अधिनियम में बताया गया है कि महानगर मजिस्ट्रेट या न्यायिक मजिस्ट्रेट, अगर किसी मामले में अधिकारिता हो या न हो, इस अधिनियम के अधीन या उस समय लागू किसी अन्य विधि के अधीन किसी अन्वेषण के दौरान या जाँच के बाद या विचारण के शुरू होने से पहले किसी भी समय अपने से की गयी संस्वीकृति या कथन को अभिलिखित कर सकता है।

साथ ही यह भी जान ले कि उपधारा 1 के अधीन की गयी संस्वीकृत और कथनो का अभिलेखन किसी अपराध के अभियुक्त के अधिवक्ता की हाजिरी में ऑडियो – वीडियो इलेक्ट्रॉनिक साधनो के द्वारा भी किया जा सकेगा।

शपथ पत्र (Affidavit) क्या होता है

धारा 164 में दो शब्द आते हैं :-

  • संस्वीकृति
  • कथन

1. संस्वीकृत संस्वीकृति का अर्थ स्वयं के द्वारा स्वीकार करना, जिसमे अभियुक्त स्वयं यह स्वीकार करता है कि यह अपराध उसके द्वारा ही किया गया है या वह उस अपराध के किये जाने में शामिल था ऐसा बयान मजिस्ट्रेट के समक्ष देता है, जिसको मजिस्ट्रेट द्वारा स्वयं अभिलिखित किया जाता है।

2. कथन – कथन का अर्थ उस बयान से है जो कि किसी अपराध की हुई शिकार पीड़िता या पीड़ित द्वारा उस अपराध की आप बीती का मजिस्ट्रेट के समक्ष वर्णन करना जिसे मजिस्ट्रेट के द्वारा स्वयं अभिलिखित किया जाता है।

परिवाद पत्र क्या है

धारा 164 सीआरपीसी से जुड़े सवाल

प्रश्न :- कृपया बताये – धारा 164 सीआरपीसी के अंतर्गत पीड़िता के द्वारा मजिस्ट्रेट के सामने किए गए कथन का अवलोकन विवेचना अधिकारी द्वारा किस स्थान पर किया जाता है और कितने समय के अंदर क्या जब तक धारा 164 सीआरपीसी के बयान का अवलोकन नहीं हो जाता तब तक पीड़ित पुलिस अभिरक्षा में रहेगी |

उत्तर :-  यहाँ पर यह ध्यान देना होगा कि अगर पीड़ित द्वारा अपना बयान मजिस्ट्रेट के सामने दे दिया गया है तब आप जान ले कि इसमें कोई समय सीमा को नहीं बताया गया है | जिसके अंदर आपके इन्वेस्टीगेशन ऑफिसर को एग्जामिनेशन करनी हो, वह एक्जामिनेशन करने के लिए वह उतना ही समय लेगा जितना उसके एग्जामिनेशन को सही से परफॉर्म करने के लिए लगे या फिर कोर्ट द्वारा जो आर्डर दिया गया होगा उसके हिसाब से उतने समय के अंदर ऑफिसर को एग्जामिनेशन रिपोर्ट  मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत करनी होती है |

अब यहाँ ध्यान देने वाली ये बात है कि अगर पीड़ित चाहे तो अपनी सुरक्षा के लिए पुलिस प्रोटेक्शन का एक एप्लीकेशन मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत कर सकता है |

वादी (Petitioner), प्रतिवादी (Respondent) क्या होता है

आपको आज दंड प्रक्रिया संहिता  की धारा 164 के बारे में जानकारी हो गई होगी | इसमें  क्या अपराध बनता है, कैसे इस धारा को लागू किया जायेगा ?  इन सब के बारे में विस्तार से हमने उल्लेख किया है, यदि फिर भी इस धारा से सम्बन्धित या अन्य धाराओं से सम्बंधित किसी भी प्रकार की कुछ भी शंका आपके मन में हो या अन्य कोई जानकारी प्राप्त करना चाहते है, तो आप  कमेंट बॉक्स के माध्यम से अपने प्रश्न और सुझाव हमें भेज सकते है |

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