काला कोट ही क्यों पहनते हैं वकील | वकीलों को कितने नामो से जाना जाता हैं ?

मित्रों आपने अपने आस पास के अदालतों के अंदर अक्सर कुछ लोगो को देखा होगा जो काला कोट और साथ में टाई नुमा बैंड भी लगाए हुए रहते हैं इनको ही वकील कहा जाता है | लेकिन क्या आप जानते है कि ये जो काला कोट पहने हुए व्यक्ति अदालतों में दिखाई देते हैं इनको कई नामो से जाना जाता है | आज हम आपको इस पेज पर ये बताएंगे कि वकीलों को कितने नामो से जाना जाता है और उनके कार्यों में क्या अंतर होता है |

यहाँ हम ये भी बताएंगे कि आखिर क्यों इनकी ये ख़ास ड्रेस जो कि कला कोट होती है और इनकी पहचान भी है | इस प्रोफेशन में एक निश्चित ड्रेस होने का कारण भी है जिसके बारे मे भी आपको जानकारी इस आर्टिकल के मध्यमम से हो जाएगी | इस ख़ास ड्रेस की वजह से अदालतों में वकील दूर से ही पहचान में आ जाते हैं।

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काला कोट ही क्यों पहनते हैं वकील

आइये सबसे पहले हम वकीलों की ड्रेस के बारे में बात करते हैं इसमें आता है सबसे प्रमुख कला कोट | तो इसमें भी बहुत सारे लोगो द्वारा बहुत सी बातें बतायी जाती है, हम कोर्ट में देखते हैं कि जज और वकील दोनों लोग कला कोट पहने हुए रहते हैं | इसके साथ वो एक ख़ास किस्म का वस्त्र और पहनते हैं जिसे गाउन कहा जाता है |

यहाँ आपको जानकारी दे दें कि अधिवक्ता अधिनियम 1961 में कहा गया है कि वकीलों के लिए एक ख़ास ड्रेस कोड होगा इसके लिए नियम बनाये गए हैं जोकि अधिनियम में समाहित हैं | इसके अनुसार अदालत के अंदर  वक़ील और न्यायाधीशों को काला कोट तथा साथ में गले पर बैंड पहनने का नियम बनाया गया है। इसकी शुरुआत इंग्लैंड से हुई मानी जाती हैं । सबसे पहले काले रंग का कोट वकीलों द्वारा इंग्लैंड में ही पहना गया है।

सन  1685 में किंग चार्ल्स दि्तीय का निधन हो गया था, जिसके बाद कोर्ट के सभी वकीलों को शोक प्रकट करने के लिए काले रंग का गाउन/कोर्ट पहनने का आदेश दिया गया था। इसके बाद कोर्ट में काले रंग का कोर्ट पहनने का चलन शुरू हो गया। हमारे यहाँ भारतीय न्यायपालिका में बहुत सारी ऐसे बातें हैं जो अंग्रेजों के समय से जारी हैं, इसलिए आज भी काले रंग का कोट वकील पहनते हैं। ऐसा भी माना जाता हैं कि काला रंग अंधत्व का प्रतीक है। इसका अर्थ यह है कि वक़ील एवं न्यायाधीश किसी तरह का पक्षपात नहीं करेंगे। जज न्याय के प्रति अटल रहेगा और वक़ील अपने मुवक्किल के प्रति ईमानदार रहेगा।

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गाउन की बात

आपको जानकारी दे दें कि उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय के वकीलों और न्यायधीशों द्वारा गाउन भी पहना जाता है। इंग्लैंड की अदालतों में भी इसी प्रकार का गाउन पहना जाता है। इस गाउन की शुरुआत इंग्लैंड द्वारा ही कि गई । कहते हैं कि वकालत अधिकांश सेवा भाव के रूप में धनवान और उच्च शिक्षित लोगों द्वारा की जाती थी, जिनमे गाउन पहनना एक सम्पन्न लोग कि पहचान थी ऐसे लोग इस तरह का गाउन पहनते थे।

ये भी कहा जाता हैं कि वकीलों द्वारा मुवक्किल से कोई फीस नहीं मांगी जाती थी। वकालत अधिकांश सेवार्थ रूप से धनवान उच्च शिक्षित लोगों द्वारा की जाती थी, ऐसे लोग इस तरह का गाउन पहनते थे। इस गाउन में पीछे दो पॉकेट होते थे तथा मुवक्किल अपने वकील के इस गाउन की जेब में जो श्रद्धा भक्ति होती थी, उसके अनुसार धन डाल दिया करते थे। वकीलों द्वारा मुवक्किल से कोई फीस नहीं मांगी जाती थी।

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बैंड के बारे में

बैंड की बात करे तो,  बैंड वकीलों की ड्रेस में एक अहम् रोल निभाता हैं या यूँ कहे ये एक वकीलों की ड्रेस का अहम हिस्सा है | यहाँ पर भारतीय वकीलों के लिए बैंड अनिवार्य भी किया गया है। यह बैंड लिनन के एक कड़क कपडे से बना  होता था। लिनन काफी महंगा कपड़ा होता था, जिससे मिस्र में मुर्दो को लपेटकर पिरामिड इत्यादि में रखा जाता था, जिससे मिस्र में मुर्दो को लपेटकर पिरामिड इत्यादि में रखा जाता था। अधिवक्ता अधिनियम 1961 के तहत अदालतों में सफेद बैंड टाई के साथ काला कोट पहन कर आना अनिवार्य कर दिया गया था।

कितने नामों से जाने जाते हैं वक़ील

आइये अब जानते हैं कि वकीलों को कितने नामो से जाना जाता हैं ? अक्सर हमारे द्वारा वकील ही सामान्यतः वक़ील बोलचाल में प्रयोग किया जाता हैं | लेकिन इन्हे कई और नामो से भी जाना जाता हैं जैसे प्लीडर,अधिवक्ता, अभिभाषक,एडवोकेट, एडवोकेट जनरल, अटॉर्नी जनरल, लॉयर, लोक अभियोजक,सालिसिटर। वक़ील शब्द की उत्पत्ति उर्दू भाषा से है तथा यह उस समय से प्रचलन में है, जिस समय से भारत में मुगल शासक शासन किया करते थे।

आपने फिल्मो में सुना होगा “ताज़िरात ए हिन्द” के तहत सजा सुनाई जाती हैं , इसका कारण था पुराने समय में दंड संहिता के नाम पर भारत में ताज़िरात ए हिन्द लागू थी, बाद में ब्रिटिश शासकों द्वारा इसे भारतीय दंड संहिता का नाम दिया गया | आज वर्तमान में भारतीय न्यायालयों में केवल अधिवक्ता,अभिभाषक और एडवोकेट शब्द से लिखित रूप में वकीलों को जाना जाता है, परन्तु वकीलों के कार्यों एवं कार्य क्षेत्र के अनुसार इनके भिन्न भिन्न पद भी है।

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लॉयर किसे कहते हैं

ये शब्द अंग्रेजी में पॉपुलर हैं जी हाँ हम बात कर रहे हैं शब्द ‘लॉयर’ के बारे में ।  जिसके पास लॉ (law) की डिग्री होती है वह लॉयर कहलाता है | ‘लॉयर’ कानून के क्षेत्र में प्रशिक्षित होता है और वह कानूनी मामलों पर सलाह और सहायता प्रदान करने का कार्य करता है। हम इसे यूँ भी समझ सकते हैं कि विधि सब्जेक्ट से जिसने स्नातक किया है, कानून का जानकार, या जिसने LLB की डिग्री ले ली हो, वह तुरंत लॉयर बन जाता है।

यहाँ ध्यान देने योग्य ये बात है कि अभी उसके पास न्यायालय में मुकदमा को लड़ने की अनुमति नहीं होती है, इसके लिए उसको बार काउंसिल ऑफ इंडिया से सर्टिफिकेट प्राप्त करना होता है, इसके बाद BCI की परीक्षा को पास कर लेने पर वह किसी भी कोर्ट में पैरवी के लिए अधिकृत हो जाता है, तब वह एडवोकेट बन जाता है। लेकिन यहाँ यह जानना जरुरी है कि हर एडवोकेट लॉयर होता है, परन्तु हर लॉयर एडवोकेट नहीं होता।

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एडवोकेट किसे कहते हैं

जैसा कि हमने अभी ऊपर बताया कि BCI की परीक्षा को पास कर लेने पर लॉयर किसी भी कोर्ट में पैरवी के लिए अधिकृत हो जाता है, तब वह एडवोकेट बन जाता है। तो इस प्रकार एडवोकेट, जिसे हम अधिवक्ता, अभिभाषक भी कहते है। अधिवक्ता का शाब्दिक अर्थ होता है ‘आधिकारिक वक्ता’ | यहाँ अधिवक्ता उसे कहते हैं जिसके पास किसी के तरफ से बोलने का अधिकार होता है |

एडवोकेट वह होता है, जिसको कोर्ट में किसी अन्य व्यक्ति की तरफ से पैरवी करने का अधिकार प्राप्त हो। आसान भाषा में कहें तो एडवोकेट दूसरे व्यक्ति की तरफ से दलीलों को कोर्ट में प्रस्तुत करता है। यहाँ यह आवश्यक है कि अधिवक्ता बनने के लिए कानून (Law) की पढ़ाई की होनी चाहिए। व्यक्ति पहले लॉयर बनता है उसके बाद फिर एडवोकेट |

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बैरिस्टर किसे कहते हैं

जब कोई व्यक्ति लॉ (law) की डिग्री इंग्लैंड से प्राप्त करता है तो उसे बैरिस्टर कहा जाता है । बैरिस्टर एक तरह वकील का ही प्रकार होता है जो कि आम कानून न्यायालय में अपनी प्रैक्टिस करता है परन्तु बैरिस्टर का अर्थ शिक्षा द्वारा इंगित किया जाता है। व्यक्ति यदि विधि शिक्षा इंग्लैंड के किसी विश्वविद्यालय से अर्जित करता है तो वह बैरिस्टर होगा क्योंकि इंग्लैंड में विधि की उपाधि उसे ही प्राप्त होती है जो इंग्लैंड का मौखिक संविधान कंठस्थ करता है। इसका अर्थ है बैरिस्टर को इंग्लैंड का मौखिक संविधान याद होता है |  राज्य की बार कौंसिल में बैरिस्टर जब अपना नाम दर्ज़ करवा देता है तब उसे एडवोकेट का दर्जा प्राप्त हो जाता है।

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लोक अभियोजक किसे कहते हैं

जिस भी व्यक्ति द्वारा लॉ (law) की डिग्री लेली गई हो, जो एडवोकेट होने की योग्यता रखता हो, साथ में BCI की परीक्षा को भी पास कर लिया हो | ऐसे व्यक्ति को राज्य सरकार द्वारा नामित या नियुक्त किया गया हो पीड़ित का पक्ष कोर्ट में रखने के लिए अर्थात विक्टिम की तरफ से कोर्ट में प्रस्तुत होता है तो इसे ही पब्लिक प्रोसिक्यूटर या लोक अभियोजक कहा जाता है।

लोक अभियोजक का उल्लेख दंड प्रक्रिया सहिंता की सेक्शन 24 के 2 (u) में प्रावधानित है। आपको जानकारी देते चले कि लोक अभियोजक एक ऐसा व्यक्ति है जिसे आपराधिक मामलों में राज्य की ओर से मामलों का प्रतिनिधित्व करने के लिए केंद्र सरकार या राज्य सरकार द्वारा दंड प्रक्रिया के प्रावधानों के तहत नियुक्त किया जाता है। जनता के हित में न्याय दिलाने का कार्य लोक अभियोजक करता है | सरकारी अभियोजक का काम तब शुरू होता है जब पुलिस ने अपनी जांच समाप्त कर कोर्ट में आरोपी के खिलाफ चार्ज शीट दायर की हो। सरकारी वकील से अपेक्षा की जाती है कि वह निष्पक्ष रूप से कार्य करे और मामले के सभी तथ्यों, दस्तावेजों, और साक्ष्य को प्रस्तुत करे ताकि सही निर्णय पर पहुंचने में अदालत की सहायता की जा सके।

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प्लीडर  किसे कहा जाता हैं

यहाँ भी हम कह सकते है कि जिस भी व्यक्ति द्वारा लॉ (law) की डिग्री लेली गई हो अर्थात व्यक्ति लॉ डिग्रीधारी हो या वो एडवोकेट है, और प्राइवेट पक्ष की तरफ से कोर्ट में आता है तो वह प्लीडर बन जाता है। प्लीडर का कार्य अपने मुवक्किल की ओर से कानून की अदालत में याचिका दायर करना होता है और साथ में उसकी पैरवी भी करता है। सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 में धारा 2 (7) के तहत एक सरकारी याचिकाकर्ता भी बनता है, जो राज्य सरकार द्वारा सिविल प्रोसीजर कोड 1908 के अनुसार, सभी सरकारी कार्यों के लिए नियुक्त किया जाता है।

 महाधिवक्ता (Advocate general) कौन होता हैं

एक ऐसा व्यक्ति जिसके पास लॉ (law) की डिग्री है, जिसके पास एडवोकेट होने की क्षमता है और अगर वह राज्य सरकार की तरफ से उनका पक्ष रखने के लिए कोर्ट में आता है तो उसे महाधिवक्ता या Advocate General कहा जाता है। भारत में, एक एडवोकेट जनरल एक राज्य सरकार का कानूनी सलाहकार होता है। इस पद को भारत के संविधान द्वारा बनाया गया है। प्रत्येक राज्य का राज्यपाल, महाधिवक्ता, एक ऐसे व्यक्ति को नियुक्त करता है, जो उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त होने के लिए योग्य हो।

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महान्यायवादी किसे कहते हैं

अब वही व्यक्ति जिसके पास लॉ की डिग्री है, एडवोकेट होने की क्षमता है और अब अगर ये केंद्र सरकार की तरफ से कोर्ट में उनका पक्ष रखने के लिए प्रस्तुत होता है तो वह महान्यायवादी (Attorney General) बन जाता है। संविधान के अनुच्छेद 76 के तहत भारत के महान्यायवादी पद का सृजन किया गया है । देश का सर्वोच्च कानून अधिकारी महान्यायवादी (Attorney General) होता है। इनकी नियुक्ति राष्ट्रपति  के द्वारा होती है। उच्चतम न्यायालय के किसी न्यायाधीश के समान योग्यता रखने वाला व्यक्ति ही महान्यायवादी (Attorney General) बनाया जाता है |  दूसरे शब्दों में कहें तो, उसके लिए आवश्यक है कि वह भारत का नागरिक हो, उसे उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में काम करने का पांच वर्षों का अनुभव हो या किसी उच्च न्यायालय में वकालत का 10 वर्षों का अनुभव हो या राष्ट्रपति के मत अनुसार वह न्यायिक मामलों का योग्य व्यक्ति हो।

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सॉलिसिटर जनरल किसे कहते हैं

देश का सर्वोच्च कानून अधिकारी “महान्यायवादी” (Attorney General) का असिस्टेंट या यूँ कहें कि जो “महान्यायवादी” के कार्यों में सहायता करे उसे सॉलिसिटर जनरल कहा जाता है। इसके पास भी लॉ की डिग्री और एडवोकेट होने की योग्यता का होना आवश्यक है वह देश का दूसरा कानूनी अधिकारी होता है |

भारत में अटॉर्नी जनरल की तरह, सॉलिसिटर जनरल और विधि अधिकारियों (नियम और शर्तें) नियम, 1972 के संदर्भ में भारत में सॉलिसिटर जनरल भी सरकार को सलाह देते हैं और उनकी ओर से पेश होते हैं। हालांकि, अटॉर्नी जनरल के पद के विपरीत, जो कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 76 के तहत एक संवैधानिक पद है, सॉलिसिटर जनरल और अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के पद केवल वैधानिक हैं।

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आपको आज वकीलों को कितने नामो से जाना जाता है और उनके कार्यों में क्या अंतर होता है? वकील काला कोट ही क्यों पहनते हैं इसके  बारे में जानकारी हो गई होगी | यदि फिर भी इससे सम्बन्धित या अन्य लॉ से सम्बंधित किसी भी प्रकार की कुछ भी शंका आपके मन में हो या अन्य कोई जानकारी प्राप्त करना चाहते है, तो आप कमेंट बॉक्स के माध्यम से अपने प्रश्न और सुझाव हमें भेज सकते है |

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