पॉक्सो एक्ट धारा 33 क्या है | Pocso Act Section 33 in Hindi – विवरण

पॉक्सो एक्ट की धारा 33 क्या है

आज हम आपके लिए इस पेज पर पॉक्सो एक्ट (Pocso Act) की धारा 33 की जानकारी लेकर आये है | यहाँ हम आपको बताएँगे  कि पॉक्सो एक्ट (Pocso Act) की धारा 33 किस प्रकार से परिभाषित की गई है और इसका क्या अर्थ है ? पॉक्सो एक्ट की धारा 33 क्या है, इसके बारे में आप यहाँ जानेंगे |

विशेष न्यायालयों की प्रक्रिया और शक्तियां

इस पोर्टल के माध्यम से यहाँ धारा 33 क्या बताती है ? इसके बारे में पूर्ण रूप से बात होगी | साथ ही इस पोर्टल www.nocriminals.org पर अन्य पॉक्सो एक्ट (Pocso Act) की महत्वपूर्ण धाराओं के बारे में विस्तार से बताया गया है आप उन आर्टिकल के माध्यम से अन्य धाराओं के बारे में भी विस्तार से जानकारी प्राप्त कर सकते हैं |

पॉक्सो एक्ट धारा 21 क्या है
पॉक्सो एक्ट धारा 22 क्या है
पॉक्सो एक्ट धारा 23 क्या है
पॉक्सो एक्ट धारा 24 क्या है
पॉक्सो एक्ट धारा 25 क्या है
पॉक्सो एक्ट धारा 26 क्या है 
पॉक्सो एक्ट धारा 27 क्या है
पॉक्सो एक्ट धारा 28 क्या है
पॉक्सो एक्ट धारा 29 क्या है
पॉक्सो एक्ट धारा 30 क्या है

[Pocso Act Sec. 33 in Hindi]

पॉक्सो एक्ट धारा 32 क्या है

Pocso Act (पॉक्सो एक्ट) की धारा 33 के अनुसार :-

विशेष न्यायालयों की प्रक्रिया और शक्तियां

(1) कोई विशेष न्यायालय, अभियुक्त को विचारण के लिए उसको सुपुर्द किए बिना किसी अपराध का संज्ञान ऐसे अपराध का गठन करने वाले तथ्यों का परिवाद प्राप्त होने पर या ऐसे तथ्यों की पुलिस रिपोर्ट पर, ले सकेगा।

(2) यथास्थिति, विशेष लोक अभियोजक या अभियुक्त के लिए उपसंजात होने वाला काउंसेल बालक की मुख्य परीक्षा, प्रतिपरीक्षा, या पुनःपरीक्षा अभिलिखित करते समय बालक से पूछे जाने वाले प्रश्नों को, विशेष न्यायालय को संसूचित करेगा जो क्रम से उन प्रश्नों को बालक के समक्ष रखेगा।

(3) विशेष न्यायालय, यदि वह आवश्यक समझे, विचारण के दौरान बालक के लिए बार-बार विराम अनुज्ञात कर सकेगा।

(4) विशेष न्यायालय, बालक के परिवार के किसी सदस्य, संरक्षक, मित्र या नातेदार की, जिसमें बालक का भरोसा और विश्वास है, न्यायालय में उपस्थिति अनुज्ञात करके बालक के लिए मित्रतापूर्ण वातावरण सृजित करेगा।

(5) विशेष न्यायालय यह सुनिश्चित करेगा कि बालक को न्यायालय में साक्ष्य देने के लिए बार-बार नहीं बुलाया जाए।

(6) विशेष न्यायालय, विचारण के दौरान आक्रामक या बालक के चरित्र हनन संबंधी प्रश्न पूछने के लिए अनुज्ञात नहीं करेगा और यह सुनिश्चित करेगा कि सभी समय बालक की गरिमा बनाए रखी जाए।

(7) विशेष न्यायालय यह सुनिश्चित करेगा कि अन्वेषण या विचारण के दौरान किसी भी समय बालक की पहचान प्रकट नहीं की जाए:

परंतु ऐसे कारणों से जो अभिलिखित किए जाएं, विशेष न्यायालय ऐसे प्रकटन की अनुला दे सकेगा, यदि उसकी राय में ऐसा प्रकटन बालक के हित में है।

स्पष्टीकरण

इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, बालक की पहचान में, बालक के कुटुंब, विद्यालय, नातेदार, पड़ोसी की पहचान या कोई अन्य सूचना जिसके द्वारा बालक की पहचान का पता चल सके सम्मिलित होंगे।

(8) समुचित मामलों में विशेष न्यायालय, दंड के अतिरिक्त, बालक को कारित किसी शारीरिक या मानसिक आघात के लिए या ऐसे बालक के तुरंत पुनर्वास के लिए उसको ऐसे प्रतिकर के संदाय का निदेश दे सकेगा जो विहित किया जाए।

(9) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए विशेष न्यायालय को इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध के विचारण के प्रयोजन के लिए सेशन न्यायालय की सभी शक्तियां होंगी और ऐसे अपराध का विचारण ऐसे करेगा, मानो वह सेशन न्यायालय हो, और यथाशक्य सेशन न्यायालय के समक्ष विचारण के लिए दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 में विनिर्दिष्ट प्रक्रिया का अनुसरण करेगा।

पॉक्सो एक्ट धारा 31 क्या है

According to Pocso Act Section 33 –    “PROCEDURE AND POWERS OF SPECIAL COURTS”–

 (1) A Special Court may take cognizance of any offence, without the accused being committed to it for trial, upon receiving a complaint of facts which constitute such offence, or upon a police report of such facts.

(2) The Special Public Prosecutor, or as the case may be, the counsel appearing for the accused shall, while recording the examination–in–chief, cross-examination or re-examination of the child, communicate the questions to be put to the child to the Special Court which shall in turn put those questions to the child.

(3) The Special Court may, if it considers necessary, permit frequent breaks for the child during the trial.

(4) The Special Court shall create a child-friendly atmosphere by allowing a family member, a guardian, a friend or a relative, in whom the child has trust or confidence, to be present in the court.

(5) The Special Court shall ensure that the child is not called repeatedly to testify in the court.

(6) The Special Court shall not permit aggressive questioning or character assassination of the child and ensure that dignity of the child is maintained at all times during the trial.

(7) The Special Court shall ensure that the identity of the child is not disclosed at any time during the course of investigation or trial:

Provided that for reasons to be recorded in writing, the Special Court may permit such disclosure, if in its opinion such disclosure is in the interest of the child.

Explanation

For the purposes of this sub–section, the identity of the child shall include the identity of the child‘s family, school, relatives, neighbourhood or any other information by which the identity of the child may be revealed.

(8) In appropriate cases, the Special Court may, in addition to the punishment, direct payment of such compensation as may be prescribed to the child for any physical or mental trauma caused to him or for immediate rehabilitation of such child.

(9) Subject to the provisions of this Act, a Special Court shall, for the purpose of the trial of any offence under this Act, have all the powers of a Court of Session and shall try such offence as if it were a Court of Session, and as far as may be, in accordance with the procedure specified in the Code of Criminal Procedure, 1973 for trial before a Court of Session.

पॉक्सो एक्ट धारा 30 क्या है

 मित्रों उपरोक्त वर्णन से आपको आज पॉक्सो एक्ट (Pocso Act) की धारा 33 के बारे में जानकारी हो गई होगी | कैसे  इस धारा  को  लागू  किया जायेगा ?  इन सब के बारे में विस्तार से हमने उल्लेख किया है, यदि फिर भी इस धारा से सम्बन्धित या अन्य धाराओं से सम्बंधित किसी भी प्रकार की कुछ भी शंका आपके मन में हो या अन्य कोई जानकारी प्राप्त करना चाहते है, तो आप  हमें  कमेंट  बॉक्स  के  माध्यम  से  अपने प्रश्न और  सुझाव हमें भेज सकते है | इसको अपने मित्रो के साथ शेयर जरूर करें |

पॉक्सो एक्ट धारा 29 क्या है

Leave a Comment