क्या कोई ऐसा व्यक्ति जो अधिवक्ता नहीं है, न्यायालय में किसी केस की पैरवी कर सकता है?

क्या किसी केस की पैरवी करने के लिए न्यायालय में कोई ग़ैर-वक़ील व्यक्ति पेश हो सकता है? या यूँ कहें कि क्या कोई केस किसी ऐसे व्यक्ति को न्यायालय में अपनी पैरवी करने के लिए कह सकता है जो अधिवक्ता नहीं है? या फिर आपके मन ऐसा प्रश्न आता होगा कि क्या कोई वयक्ति अपना केस स्वयं न्यायालय में समक्ष प्रस्तुत कर सकता है ? आज के इस आर्टिकल के माध्यम से हम आपसे इन्हीं विषयों पर विस्तार से चर्चा करने जा रहे है |

इस पोर्टल के माध्यम से यहाँ क्या कोई ऐसा व्यक्ति जो अधिवक्ता नहीं है, न्यायालय में किसी केस की पैरवी कर सकता है?  इसके बारे में पूर्ण रूप से बात होगी | साथ ही इस पोर्टल www.nocriminals.org पर अन्य भारतीय दंड संहिता (IPC) ,CrPC इत्यादि के बारे में विस्तार से बताया गया है आप उन आर्टिकल के माध्यम से अन्य विषयों के बारे में भी विस्तार से जानकारी प्राप्त कर सकते हैं |

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कानून (अधिवक्ता एक्ट) क्या कहता है

अधिवक्ता एक्ट की धारा 30 में बताया गया है कि “ऐसा कोई भी अधिवक्ता जिसका नाम राज्य की लिस्ट में शामिल है उसे उच्चतम न्यायालय सहित किसी भी न्यायालय में किसी भी ट्रिब्यूनल या व्यक्ति जिसको क़ानूनी तौर पर साक्ष्य (सबूत) लेने को अधिकृत किया गया है, के सामने या अभ्यास करने का अधिकार है और किसी भी अन्य अथॉरिटी या व्यक्ति के सामने इस प्रकार के अधिवक्ता को किसी क़ानून के द्वारा या उसके अंतर्गत कुछ समय के लिए अभ्यास करने की छूट दी जाती है ।“

अधिवक्ता एक्ट की धारा 33 में यह बताया गया है कि किसी भी व्यक्ति को किसी न्यायालय या किसी अथॉरिटी के सामने अभ्यास  करने की अनुमति नहीं होगी, जब तक कि वह एक अधिवक्ता के तौर पर पंजीकृत (Registered) नहीं है । धारा 29 में बतया गया है कि अधिवक्ता एकमात्र ऐसे मान्यता प्राप्त व्यक्ति हैं जिन्हें क़ानून के अभ्यास का अधिकार है ।

लेकिन यहाँ गौर करने वाली ये बात है कि वहीं अधिवक्ता एक्ट की धारा 32 किसी भी न्यायालय, अथॉरिटी या “व्यक्ति को यह अधिकार देता है कि वह ऐसे व्यक्ति जो इस अधिनियम के अंतर्गत अधिवक्ता के तौर पर पंजीकृत (Registered) नहीं है, को अपने या उसके सामने किसी विशेष केस में पैरवी की अनुमति दे सकता है ।“

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ग़ैर-वक़ील पेश हो सकते हैं अगर न्यायालय अनुमति दे

उच्चतम न्यायालय ने हरिशंकर रस्तोगी बनाम गिरधारी शर्मा, AIR 1978 SC 1019 केस में इस सवाल का जबाब दिया है इस फ़ैसले में शीर्ष न्यायालय ने कहा

“कोई निजी व्यक्ति जो वक़ील नहीं है, को अदालत में पेश होने और किसी पक्षकार की ओर से पैरवी करने का अधिकार नहीं है, उसे इसके लिए अदालत की पूर्व अनुमति लेनी होगी और इसके लिए पक्षकार को ही पहल करनी होगी । इसकी अनुमति देना या नहीं देना यह अदालत की इच्छा पर है । ऐसा भी हो सकता है कि अदालत इसकी अनुमति देने के बाद बीच में ही इसे वापस ले ले अगर उसको लगता है कि प्रतिनिधि कोई नींदनीय काम कर रहा है । इसकी अनुमति देने या इंकार करने से पहले संबंधित व्यक्ति के बारे में जानकारी, उसका संबंध, किसी निजी व्यक्ति की सेवा लेने की अनुमति की वजह और अन्य परिस्थितियों के बारे में सूचनाएं इकट्ठी की जानी चाहिए ।”

दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) 1973 (सीआरपीसी) की धारा 2 (q) को ध्यान से पढ़े तो हम पाते हैं कि इसमें अधिवक्ता, परिभाषा के अनुसार, ऐसा व्यक्ति जिसको क़ानून ने किसी न्यायालय में क़ानून की अभ्यास के लिए अधिकृत किया है के अतिरिक्त ऐसा कोई भी व्यक्ति हो सकता है अगर उसे न्यायालय की की अनुमति प्रदान कर दी जाती है ।

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न्यायमूर्ति वीआर कृष्ण अय्यर ने इस विषय में कहा

“अगर ऐसा है भी, तो क्या यह उस पक्ष पर निर्भर नहीं करता जो कि किसी कारण से अपना केस ठीक तरीक़े से पेश नहीं कर सकता, कि वह इसके बदले किसी अन्य व्यक्ति की मदद ले? इस आग्रह को ठुकराना कुछ विशेष मामलों में न्याय से पूरी तरह इंकार करना हो सकता है, विशेषकर एक ऐसे देश में जहां निरक्षरता और ग़रीबी है, जबकि न्यायिक प्रक्रिया बहुत ही उन्नत प्रकृति की है । यही कारण है कि विधायी नीति में इसका ध्यान रखा गया है और इस तरह की ज़रूरतें पूरी की गई हैं ।

सीआरपीसी की धारा 302, 303 और 304 विधायिका की इस नीतियों को दर्शाती है । मुझे नहीं लगता कि इस अदालत में हमें पक्षकार के अलावा किसी व्यक्ति के प्रतिनिधित्व की व्यवस्था को उस स्थिति में पूरी तरह बंद कर दें जब वक़ील उस पक्षकार की ओर से पेश नहीं हो रहा है । मुफ़्त क़ानूनी सेवाओं के लिए विस्तृत कार्यक्रम एक तरह से राज्य का गंभीर दायित्व है अगर क़ानून के शासन को ज़्यादा महत्व देना है । तब तक के लिए पक्षकार अपने वक़ील के माध्यम से (अदालत में) पेश हो सकते हैं और अगर उन्हें वक़ील उपलब्ध नहीं हैं, तो इसके लिए वे अपने किसी मित्र का चुनाव कर सकते हैं ।

यह दूसरा व्यक्ति ऐसा नहीं हो सकता है जो आदतन किसी भी पक्ष के प्रतिनिधि के रूप में अदालत में पेश होता है तो उस स्थिति में वह पेशेवर रूप में एडवोकेट अधिनियम के तहत पाबंदियों का उल्लंघन करेगा । मैं उसे इसकी अनुमति नहीं दे सकता । इसके बावजूद, किसी मामले के पक्षकार पर यह निर्भर करता है कि वह किसी ग़ैर-वक़ील को किसी विशेष मामले में अपना प्रतिनिधित्व करने के लिए चुने । किसी पेशे की प्रैक्टिस करना किसी मित्र या रिश्तेदार का किसी अवसर पर या किसी मामले में या कुछ मौक़ों पर प्रतिनिधित्व करना पूरी तरह अलग मामला है । वर्तमान मामले में, ग़ैर-वक़ील के माध्यम से प्रतिनिधित्व की माँग की गई है ।

यह पूरी तरह स्पष्ट है कि कोई भी व्यक्ति को एडवोकेट नहीं है, अदालत में ज़बरदस्ती घुसने को अपना अधिकार नहीं मान सकता और किसी के लिए जिरह करने का दावा नहीं कर सकता। स्थिति को देखते हुए और कई सारे कारकों का ख़याल रखते हुए यह अदालत इस तरह के ग़ैर-पेशेवर प्रतिनिधित्व की अनुमति दे सकता है । यह सीआरपीसी की नीतियों (मेरा मतलब यहाँ आपराधिक मामलों से है) के अनुरूप है जैसा कि धारा 2(q) में कहा गया है ।



 परिभाषा के हिसाब से, ऐसा व्यक्ति जिसको क़ानून ने किसी अदालत में क़ानून की प्रैक्टिस के लिए अधिकृत किया है के अलावा ऐसा कोई भी व्यक्ति हो सकता है अगर उसे अदालत की अनुमति से किसी विशेष मामले में शिरकत करने के लिए नियुक्त किया जाता है । श्रोताओं के विनियमन के लिए इस अदालत के अधिकार का प्रयोग धारा 2(q) की भावनाओं के अनुरूप किया जा सका है ।”

मद्रास उच्च न्यायालय ने भी इस फ़ैसले पर भरोसा करते हुए बतया था कि न्यायालय किसी भी व्यक्ति को जो कि एक अधिवक्ता के तौर पर पंजीकृत (Registered) नहीं है, न्यायालय के सामने अपना विचार प्रस्तुत करने को कह सकता है । न्यायमूर्ति ए आनंद वेंकटेश ने नक्किरन गोपाल की हिरासत को ख़ारिज करते हुए बताया था कि वरिष्ठ पत्रकार एन राम को बुलाकर उनकी सलाह लेने में कोई नुकसान नहीं था ।

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कोई एजेंट आपराधिक मामले के सुनवाई में किसी पक्ष का अधिवक्ता नहीं हो सकता

टीसी मथाई एवं अन्य बनाम ज़िला और सत्र जज (1999) 3 SCC 614 केस में बताया गया कि आपराधिक मामले की सुनवाई में कोई एजेंट किसी पक्ष कार का उस दौरान तक अधिवक्ता नहीं बन सकता जब तक कि पक्षकार इसके लिए न्यायालय की आज्ञा नहीं ले लेता । एम कृष्णम्मल बनाम टी बालासुब्रमनीय पिल्लै केस में मद्रास उच्च न्यायालय के फ़ैसले को उद्धृत किया गया ।

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न्यायमूर्ति केटी थोमस ने न्यायालय का पक्ष रखते हुए कहा था

”पॉवर ऑफ़ अटर्नी एक्ट की धारा 2 किसी क़ानून के विशेष प्रावधान की अनदेखी नहीं कर सकता है जिसमें यह ज़रूरी है कि किसी व्यक्ति के लिए एक काम को ख़ुद करना ज़रूरी है । जब संहिता के तहत यह ज़रूरी है कि आरोपी को अदालत में पेश होना ज़रूरी है, तो अगर उसके बदले में उसका पॉवर ऑफ़ अटर्नी अदालत में हाज़िर होता है तो यह नहीं कहा जा सकता कि अदालत के आदेश का पालन हुआ । यह अलग बात है कि किसी पक्ष को उसके वक़ील के माध्यम से पेश होने की अनुमति दी जाए । संहिता के अध्याय XVI के तहत मजिस्ट्रेट को यह अधिकार है कि वह आरोपी को अदालत में पेश होने के लिए सम्मन या वारंट जारी करे ।

संहिता की धारा 205 मजिस्ट्रेट को यह अधिकार देता है कि वह आरोपी को अदालत में ख़ुद पेश होने के लिए नहीं कहे और अगर उसको लगता है तो उसके वक़ील को उसके प्रतिनिधित्व की अनुमति दे । धारा 273 में आरोपी के वक़ील की मौजूदगी में साक्ष्य की रिकॉर्डिंग के बारे में अदालत के अधिकार की बात कही गई है अगर आरोपी को अदालत में पेशी से छूट मिली हुई है । पर किसी भी सूरत में किसी पॉवर ऑफ़ अटर्नी धारक को आरोपी का प्रतिनिधित्व करने की इजाज़त नहीं दी जा सकती है । इसलिए पॉवर ऑफ़ अटर्नी के आधार पर अपीलकर्ता की दलील का इस मामले में कोई मतलब नहीं है ।”

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जिमी जहांगीर मदन बनाम बॉली करियप्पा हिंडलेय (मृत) (2004) 12 SCC 509 केस में यह बताया गया कि सीआरपीसी के दोनों नियमों के अंतर्गत पॉवर ऑफ़ अटर्नी धारक से जुड़ा पक्ष का प्रतिनिधित्व करने की अनुमति दी जा सकती है बशर्ते कि ऐसा करने के लिए अनुमति ली गई है और न्यायालय ने यह अनुमति दी है । पर अगर इस प्रकार की अनुमति से जुड़ा व्यक्ति के माध्यम से नहीं माँगी गई है, जिसकाअर्थ यह हुआ कि सीआरपीसी की धारा 205 के संदर्भ में, अपराधी और धारा 302 के संदर्भ में कोई पक्ष जिसके पास अभियोजन को चलाये रखने का अधिकार है, यह साफ – साफ कहा गया है कि पॉवर ऑफ़ अटर्नी धारक को कार्यवाही से जुड़ा व्यक्ति का प्रतिनिधित्व करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है ।

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कलकत्ता उच्च न्यायालय की एकल पीठ ने भी कहा कि “केवल अधिवक्ता अधिनियम के अंतर्गत पंजीकृत (Registered) अधिवक्ता को ही किसी क़ानूनी न्यायालय में किसी केस की पैरवी करने का अधिकार होगा । इसके विरुद्ध अपील पर ध्यान देते हुए खंडपीठ ने कहा कि निकट संबंधी के केस में न्यायालय अपने विशेषाधिकार के अंतर्गत पॉवर ऑफ़ अटर्नी धारक को न्यायालय को संबोधित करने की आज्ञा दे सकता है अगर न्यायालय को लगता है कि याचिकाकर्ता की तरफ से न्यायालय में प्रस्तुत होने वाला व्यक्ति क़ानून, वास्तविक घटनाओं का जानकार है और न्यायालय को संबोधित कर सकता है और इस केस में मदद कर सकता है ।“

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अभ्यास करने का अधिकार न्यायालय में पेश होने के अधिकार से भिन्न है

अभ्यास का अधिकार किसी अधिवक्ता को क़ानून के पेशे की सभी न्यायालयों, ट्रिब्यूनलों, अथॉरिटीज़ आदि के सामने अभ्यास करने का अधिकार देता है पर न्यायालय की आज्ञा से किसी केस में पेश होने का अधिकार अधिवक्ता को अभ्यास के अधिकार का लांछन है । यद्यिप, हम अलग – अलग उच्च न्यायालयों के इस मत से सहमत हैं कि पॉवर ऑफ़ अटर्नी धारक को न्यायालय को संबोधित करने का अधिकार नहीं है, पर हमारी राय में कोई निकट संबंधी होने पर पॉवर ऑफ़ अटर्नी धारक को न्यायालय में पेश होने की आज्ञा देने का न्यायालय को अधिकार है ।

प्रमुख कानूनी शब्दावली

2018 में बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया बनाम एके बालाजी AIR 2018 SC 1382 दिए गए एक फ़ैसले में बताया गया कि “विदेशी लॉ फ़र्म भारत में अपना कार्यालय (Office) नहीं खोल सकतीं “। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि लॉ की अभ्यास का अर्थ केवल न्यायालय में पेश होना ही नहीं है बल्कि ऐसी सलाह देना भी इसमें शामिल होता है जो क़ानूनी है, किसी क़ानून का ड्राफ़्ट तैयार करना, क़ानूनी बहस वाले सभाओं में हिस्सा लेना आदि भी है ।

अधिवक्ता अधिनियम के अध्याय 4 में बताया गया है कि केवल बार काउन्सिल में पंजीकृत (Registered) अधिवक्ता ही क़ानून की अभ्यास कर सकते हैं । अन्य लोग केवल इस न्यायालय की अनुमति से ही न्यायालय में पेश हो सकते हैं जिसके सामने केस की सुनवाई लंबित है ।

क्या वकीलों को अपने कार्यों का विज्ञापन देने की अनुमति है 

अधिवक्ता अधिनियम की धारा 45 के अनुसार

यह बताना आवश्यक है कि अधिवक्ता अधिनियम की धारा 45 के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति जिसे अधिवक्ता अधिनियम के अंतर्गत न्यायालय में अभ्यास करने का अधिकार नहीं है, वह व्यक्ति न्यायालय में अभ्यास करता है तो ऐसे व्यक्ति को 6 माह तक के जेल की सज़ा दी जा सकती है 2011 में आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने इस नियम का हवाला देते हुए मडुपु हरिनारायण बनाम प्रथम अतिरिक्त ज़िला जज केश में अपने फ़ैसले में बार काउन्सिल ऑफ़ आंध्र प्रदेश को एक ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध केश दर्ज कराने का आदेश दिया जो एक पक्षकार की तरफ से जीपीए के तौर पर पेश हुआ जबकि उसको किसी भी न्यायालय में अभ्यास करने की अनुमति नहीं थी ।

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मित्रों उपरोक्त वर्णन से आपको आज कोई ऐसा व्यक्ति जो अधिवक्ता नहीं है, न्यायालय में किसी केस की पैरवी कर सकता है? के बारे में जानकारी हो गई होगी | इन सब के बारे में विस्तार से हमने उल्लेख किया है, यदि फिर भी इससे सम्बन्धित या अन्य से सम्बंधित किसी भी प्रकार की कुछ भी शंका आपके मन में हो या अन्य कोई जानकारी प्राप्त करना चाहते है, तो आप  हमें  कमेंट  बॉक्स  के  माध्यम  से अपने प्रश्न और सुझाव हमें भेज सकते है | इसको अपने मित्रो के साथ शेयर जरूर करें |

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